धर्मशास्त्र कहते हैं कि सत्ययुग में मणि का लिङ्ग, त्रेता में सोने का, द्वापर में पारे का और कलियुग में पार्थिव 【मिट्टी】 का लिङ्ग उत्तम है।


पद्मपुराण में कहा है कि सधवा स्त्रियां पार्थिव शिवलिंग की विशेष पूजा करें,  परन्तु विरक्त विधवाओं को पारे के शिवलिंग की विशेष पूजा करनी चाहिए।

गृह में रहने वाली विधवा स्फटिक के शिवलिंग का पूजन करें,  किन्तु रजस्वला स्त्री को एवं सूतक या पातक के समय पूजन नहीं करना चाहिए,  उतने समय तक मानसिक पूजा करना चाहिTए। 

किसी के पास पूजन की वस्तु न हो,  तो जल से भी कर सकती हैं।


गन्ध से किया हुआ शिव-पूजन सौ गुणा फल देता है,  उससे भी सौ गुणा पञ्चगव्य से,  उससे भी सौ गुणा देशी गौ के दूध से  तथा   उससे भी हजार गुणा कपिला गौ के दूध से,  उससे सौ गुणा उसी के घी से किया गया पूजन फल देता है।

शंकर जी के पूजन में शंख का जल चढ़ाना वर्जित है।

व्यभिचारी के द्वारा, स्त्री द्वारा तथा बायें हाथ से लाये जल से या दूसरे देवता के लिए लाये जल से शिव-पूजन न करे।


विल्वपत्र को अमावस्या-चतुर्थी-नवमी-चतुर्दशी तथा सोमवार और बुधवार को तोड़ना वर्जित है।  यदि तोड़ता है तो नरक की प्राप्ति होती है,  उसे शिव-शीश-भञ्जन का पाप लगता है।

यदि विल्वपत्र न मिले तो बासी या सूखे भी चढ़ाये जा सकते हैं  अथवा  दूसरों के द्वारा चढ़ाये हुये विल्वपत्र भी धोकर पुनः चढ़ाये जा सकते हैं।

माली के घर १ महीने तक तुलसीपत्र, ४० दिन तक बेलपत्र, ३ दिन तक कमल का पुष्प  बासी नहीं होता।

गंगाजल वर्षों तक भी बासी नहीं होता।

बर्फीले पहाडों में यदि विल्वपत्र न मिले तो पुराने विल्वपत्र या उसके चूर्ण से भी पूजन हो सकता है।

पद्मपुराण में कहा है कि फूल के मुख को मुख के साथ जोड़कर चढ़ायें,  तुलसी-बेलपत्रादि को उल्टा चढ़ायें।

चोरी की हुई पूजन-सामग्री से, फल आदि से पूजन करने पर कोई देवता प्रसन्न नहीं होता।



स्वयं तोड़कर बेलपत्र चढ़ाने से अधिक लाभ होता है, पूजन सामग्री किसी से मांगनी नहीं चाहिए।

बायें हाथ से सामग्री उठाकर देवताओं को न चढ़ायें, पुरुष सिले वस्त्र पहनकर पूजन न करे,  ऐसा करने से पूजा निष्फल होती है।

हजार धतूरे से पूजन करने पर जो फल प्राप्त होता है, वह एक बैगन के फूल से  व  हजार बैगन के फूल के बराबर एक अपामार्ग का फूल होता है   तथा  हजार अपामार्ग के फूल के बराबर एक नीले कमल का फूल है।




"तुलसीदल मात्रेण य: करोति शिवार्चनम्।

कुलैकविंशमुद्धृत्य हि सादरम् शिवलोके महीयते।।"


जो केवल तुलसीदल मात्र से शंकर जी का पूजन करता है, वह इक्कीस पीढ़ियों को शिव-लोक में ले जाता है।

किसी भी देवता को समर्पित की हुई वस्तु, देव-निमित्त आया हुआ धन, नैवेद्य, चण्ड के अधिकार में आयी हुई वस्तु, मूर्ति से बाहर डाली गई वस्तु -------- छः प्रकार का निर्माल्य कहा गया है।

देवता के नाम अर्पित किया हुआ धन-मकान-जमीन-जायदाद-सोना-चांदी-रत्न आदि देवद्रव्य हैं।

देवता के लिए संकल्पित किया हुआ पत्र-पुष्प-फल आदि नैवेद्य कहा जाता है ------ इनकी चोरी करने पर व्यक्ति कभी न छूटने वाला नरक को प्राप्त करता है।

हर हर महादेव

अस्तु